अध्याय 9 सुबह की धुंध में व्हेलों का सफर
धुंध सामने नहीं, उनके पैरों के बहुत नीचे थी।
जब लूमी मिरो की पीठ पर चढ़ी, पूरब में सुबह पतली परतों में खुल रही थी। मेघ-व्हेल के चौड़े शरीर पर चाँदी-नीले रोएँ थे और हर साँस के साथ उनमें उजले चिह्न दौड़ते थे। लूमी ने नाव जैसी डोलने की उम्मीद की थी; मिरो ऐसे उठा जैसे किसी पहाड़ को अचानक याद आया हो कि वह उड़ सकता है।
“पंख मत पकड़ना, मुझे गुदगुदी होती है।” आवाज़ जूतों के नीचे बसंत की गरज जैसी आई। लूमी हँसी और काठी की पीतल की अंगूठी थाम ली। कमर के नक्शा-खोल में माँ का अधूरा नक्शा था, सात वर्षों से खाली। आकाश-बीज के जागने के बाद हर भोर उसके किनारे पर सुनहरी रेखा उभरती थी।
मिरो धुंध में घुसा तो संसार गीला और सफेद हो गया। लूमी ने आँखें मूँद लीं: एक हवा में देवदार की गंध, दूसरी में बारिश, तीसरी में पके नाशपाती की मिठास थी। वह मिठास की ओर देख ही रही थी कि धुंध के भीतर विशाल छाया चमक उठी।
पहली प्रवासी व्हेल ऊपर से गुजरी। उसकी पीठ पर पूरा वन उगा था। जड़ें रीढ़ पर गुंथी थीं, पारदर्शी पत्ते धूप समेटते थे और बेलें हरे झरनों की तरह बादलों में उतरती थीं। दूसरी व्हेल आई, फिर तीसरी, मानो धुंध रात के नक्षत्र दिन को लौटा रही हो।
लूमी साँस लेना भूल गई। उसने नक्शों के सारे चमत्कार पढ़े थे, पर किसी ने नहीं बताया था कि कोई जंगल अपना क्षितिज खुद चुन सकता है।
मिरो ने गीत छेड़ा और झुंड ने उत्तर दिया। बीज लूमी की थैली से ऊपर उठा; मोती जैसे खोल में हरे तारों का नक्शा घूम रहा था। हजारों पत्तियाँ उसकी ओर मुड़ीं और रोशनी सबसे आगे चल रही सफेद व्हेल तक पहुँची। उसकी शाखा जैसी सींगों के बीच बिना जड़ों का बगीचा तैर रहा था।
“वह मार्गदर्शक है,” मिरो बोला। “आकाश ने जितने द्वीप खोए, उसे सब याद हैं।”
सफेद व्हेल मुड़ी। माँ का नक्शा हवा में खुला और सुनहरी राह तूफानों तथा बंद आकाश के पार एक अनजान नाम पर रुकी: प्रभात द्वीप। लूमी के पढ़ते ही उसका आधा निशान फीका पड़ गया।
“यह दूसरा सूर्योदय नहीं देख पाएगा,” आवाज़ सीधे मन में आई। सींगों का बगीचा खिल उठा; हर फूल में चमकती आँख थी। उन्होंने बीज की रोशनी को उत्तर जाती राह बना दिया।
फिर व्हेल ने लूमी का नाम लिया। तेज लय, अंत का हल्का साँस और छिपी मुस्कान—सब उसकी खोई माँ की आवाज़ थे। हवा आँसू ले गई। धुंध खुली और पारदर्शी होता द्वीप दिखा। मिरो ने नहीं पूछा कि वह डरी है; उसने पंख नीचे किए और चमकते बीज के साथ द्वीप की ओर गोता लगाया।
अध्याय 10 बादलों में भोर रोपना
प्रभात द्वीप अपना ही भार भूल रहा था।
चट्टानों से पत्थर अलग होकर पंख जैसे धूलकण बन ऊपर जा रहे थे। पेड़ हवा से झुकी मुद्रा में थे, पर पत्तों में आवाज़ नहीं थी। “सूर्योदय में ग्यारह मिनट,” मिरो ने कहा और लूमी टूटे वेधशाला पर कूद गई।
नक्शे की सुनहरी रेखा केंद्र तक जाती थी, पर बेलों का पुल बादलों की खाई के ऊपर टूटा था। नीचे से वे आवाज़ें उठीं जिन्हें द्वीप खो रहा था: लकड़ी के चक्के दौड़ाते बच्चों की हँसी, भट्ठी का दरवाजा, शीशे पर बारिश। हर स्मृति आकाश को विदा कह रही थी।
लूमी ने जड़ पर हथेली रखी। “अगर उगना याद है, मुझे रास्ता दो।” कुछ नहीं हिला। पहली रोशनी दूर व्हेलों की पीठ पार कर गई। उसने उँगली चुभोकर बीज को एक बूँद रक्त दिया। माँ की सीख लौटी: बीज आदेश नहीं मानता; केवल अपने लिए माँगी इच्छा ऐसी शाखा नहीं उगा सकती जो किसी और को थामे।
“मैं यह माँ को पाने के लिए नहीं कर रही। अभी नहीं। पहले यह द्वीप रहे।”
रोशनी जड़ में उतरी। दोनों किनारों से नई बेलें निकलीं, खाई के ऊपर मिलीं और ओस भरा पुल बन गईं। लूमी के हर कदम के नीचे सफेद फूल खुला; पंखुड़ियाँ चमकती चिड़ियों में बदलकर रास्ता दिखाने लगीं।
केंद्र में बगीचा नहीं, सूखा कुआँ था। दीवारों पर प्रवासी व्हेलों के नाम थे और सबसे नया मिरो था। धूप पूर्वी तट पर लगी और पारदर्शिता तेजी से भीतर आई।
“मुझे रोप दो,” बीज पहली बार बोला। उसकी आवाज़ वर्षों की दूरी से आई थी। “तुम क्या हो?” लूमी ने पूछा। “घर लौटने की राह।”
लूमी ने मोड़ने वाले नक्शे की चाँदी की पसली से मिट्टी खोदी। नीचे पत्थर नहीं, उलटा रात का आकाश था। तारे हाथों के नीचे बह रहे थे। उसने बीज सबसे चमकीले तारों में रखा और मिट्टी बंद की, तभी पहली किरण कुएँ में उतरी।
एक साँस तक कुछ नहीं हुआ। फिर द्वीप के भीतर दिल धड़का।
व्हेलों के नाम जगमगाए। सुनहरी जड़ें तारों, गलियों और सोए पेड़ों में दौड़ीं। पारदर्शी किनारा हरा हुआ, उड़ी धूल बारिश बनकर लौटी। द्वीप बादल-सागर में धीरे बैठ गया और फिर अपना भार पा लिया।
एक नन्हा पेड़ लूमी को कुएँ से ऊपर ले गया और वेधशाला से ऊँचा हो गया। हर पत्ता एक ओर हरा, दूसरी ओर तारों से भरा था। मिरो ने मुकुट के चारों ओर गीत गाया, दूर झुंड ने उत्तर दिया, और सरसराहट ऐसे फैली जैसे हजार हाथ नई किताब खोल रहे हों।
नई पत्तियाँ ज्ञात सीमाओं से बाहर जाती राह में सजीं। अंत में माँ की लिखावट थी: तेरहवाँ द्वीप एक ही भोर में दो बार नहीं दिखता।
एक कली थोड़ी खुली। “अगर तुम सुन रही हो, द्वीप ने तुम पर भरोसा किया। अभी मुझे खोजने मत आओ। तेरहवाँ द्वीप खोजो, मिरो और वह नक्शा लाओ जिसे तुम मेरा समझती थीं। वह आरंभ से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।”
कली बंद हुई। दूर झरनों और इंद्रधनुषों से ढका द्वीप एक पल बादलों से निकला, मछली की तरह मुड़ा और उत्तर तैर गया। सारी नई पत्तियाँ उसी ओर थीं।
तेरहवें द्वीप ने उन्हें सुन लिया था।